सोमवार, 5 जनवरी 2015

ओबामा के भारत आगमन से जुड़े हैं घटना के तार!

हरिभूमि ब्यूरो.नई दिल्ली 
बीते बुधवार को देर रात जब सारा देश नए साल के जश्न में डूबा हुआ था। तब गुजरात में अरब सागर से लगे देश के पश्चिमी तट पर विस्फोटकों से लदी एक पाकिस्तानी मछली पकड़ने वाली एक नौका द्वारा भारतीय जलसीमा में घुसकर बड़ा आतंकी हमला करने की साजिश को तटरक्षकबल के जहाज राजरतन और समुद्री निगरानी विमान डार्नियर की मुस्तैदी ने नाकाम कर दिया। यह घटना 31 दिसंबर की देर रात 3 बजकर 57 मिनट पर गुजरात में अरब सागर में भारत-पाक की समुद्री सीमा में हुई। यह इलाका पोरबंदर से समुद्र में करीब 365 किमी. दूर था। खुफिया ब्यूरो के सूत्रों का कहना है कि इस घटना के पीछे 26 जनवरी के मौके पर भारत द्वारा ओबामा को मुख्य अतिथि बनाए जाना भी एक बड़ी वजह हो सकती है।

ओबामा के आगमन से जुड़े हैं तार
खुफिया ब्यूरो के सूत्रों का कहना है कि पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए आतंकी हमले के बाद पाक में बैठे आतंकी संगठनों के सरगनाहों ने इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया था और आने वाले दिनों में देश में आतंकी हमलों की संख्या में इजाफा करने की धमकी दी थी। पेशावर हमले से पहले ही भारत ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा को 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड समारोह में मुख्य अतिथि बनाने की घोषणा कर दी थी। अफगानिस्तान में लश्कर के मुखिया ओसामा बिन लादेन के खिलाफ चलाए गए अभियान के बाद से तमाम आतंकी संगठन अमेरिका से खार खाए बैठे हैं। अब ऐसे में भारत में बामा के भव्य स्वागत की तैयारियों ने भी आतंकियों के खून में उबाल ला दिया है। इसका बदला लेने के लिए वो भारत में आतंकी हमलों की रफ्तार तेज करना चाहते हैं। इसकी एक बानगी नववर्ष के आगमन पर भी हमने देखी है। यहां बता दें कि पेशावर हमले के बाद पाक सेना ने पाक-अफगान सीमा पर मौजूद आतंकियों के सभी ठिकानों पर तेज बमबारी का अभियान चलाया हुआ है और इससे पहले वो अफगानिस्तान में लश्कर के खिलाफ चलाए जा रहे नाटो देशों के सैन्य अभियान में भी पूरी मददगार और भागीदारी रही है।

फिर से जेल की हवा खा रहा है लकवी 
मुंबई पर हुए 26/11 हमलों का मास्टर-माइंड आतंकी जकीर्उर रहमान लकवी को पाक अदालत द्वारा एक बार दी गई रिहाई के बाद दोबारा जेल में डाल दिया गया है। लकवी की रिहाई का भारत ने ही बड़े पैमाने पर विरोध किया था। जिससे यह आतंकी संगठन बौखला गए हैं। अब वो किसी भी तरह से इसका बदला लेने की कवायद करने में जुटे हुए हैं। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में आई हालिया बाढ़ में सेना के सराहनीय प्रयासों और विधानसभा चुनाव में आम लोगों के बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लेने से भी  पाक समर्थित (अफगान तालिबान भी) आतंकी बेहद खीजे हुए हैं। अब वो अपनी इस खीज का बदला निकालने के लिए वो भारत में दहशत का माहौल बनाने से नहीं चूक रहे हैं।

भारत की समुद्री सीमा में थी नौका
तटरक्षकबल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि खुफिया एजेंसियों को यह खबर मिली थी कि कराची के केटी बंदरगाह से मछली पकड़ने वाली एक नौका अरब सागर में कुछ नियमों के विरूद्ध कार्य करने की योजना बना रही थी। जब इस नौका को तटरक्षकबल के जहाज द्वारा रोकने का प्रयास किया गया तब यह भारत की समुद्री सीमा में करीब 7 नॉटिकल माइल अंदर विचरण कर रही थी।

असम हिंसा मामले पर सेना ने की तुरंत कार्रवाई: पर्रिकर

कविता जोशी.नई दिल्ली

असम में कुछ दिन पहले बोडो उग्रवादियों द्वारा आदिवासियों के नरसंहार पर सेना ने सबसे पहले कार्रवाई की। इस घटना की सूचना मिलने के तुरंत बाद सेना ने उग्रवादियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई करने का बेड़ा उठाया। यह जानकारी बीते मंगलवार रात यहां राजधानी में रक्षा संवाददाताओं से हुई एक अनौपचारिक मुलाकात में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने दी। उन्होंने असम हिंसा में सेना द्वारा देर से कार्रवाई करने को लेकर पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में कहा कि सेना ने इस मामले में कोई देरी नहीं की। गौरतलब है कि इस नरसंहार में नेशनल डेमोके्रटिक फ्रंट आॅफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के उग्रवादियों ने 80 से ज्यादा आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया जिसमें ज्यादातर मासूम बच्चे और महिलाएं शामिल थी। यह घटना असम के तीन जिलों सोनितपुर, चिरांग और कोकराझार में हुई।

टीवी पर खबर आने से पहले की कार्रवाई
रक्षा मंत्री ने कहा कि असम की इस घटना की जैसे ही मुझे जानकारी मिली। मैंने सेनाप्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग को तलब कर मामले पर तुरंत कार्रवाई करने के निर्देंश दिए। यहां बता दें कि घटना के बाद सेनाप्रमुख ने असम का दौरा भी किया था। पर्रिकर ने कहा कि जब रक्षा मंत्रालय की ओर से यह कदम उठाया जा रहा था तब तक इस बारे में टेलिविजन चैनलों पर भी कोई खबर नहीं दिखाई जा रही थी।

स्थानीय प्रशासन ने मांगी मदद
असम में आदिवासियों के साथ जो नरसंहार की घटना हुई। वो असम के स्थानीय कानून-व्यवस्था से जुड़ा हुआ मामला है। हम इस तरह के मामलों में हम सीधे कार्रवाई नहीं कर सकते। यहां भी हमें स्थानीय प्रशासन की ओर से मदद देने की मांग की गई थी। तभी हमने अभियान चलाने के लिए सेना के 73 कॉलम रवाना किए।

जीरो टॉलरेंस की नीति पर जोर
सैन्य उपकरणों की एक के बाद एक हो रही दुर्घटनाओं को लेकर रक्षा मंत्री ने कहा कि हम जीरो टॉलरेंस की नीति चाहते हैं। मैं यह मानता हूं कि इन दुर्घटनाओं की संख्या शून्य पर आनी चाहिए। लेकिन यहां यह तथ्य भी बेहद महत्वूपर्ण है कि इन हादसों की रफ्तार को एकदम नहीं रोका जा सकता लेकिन हमें शून्य की तरफ जाना चाहिए। बीते दिनों संसद की रक्षा मामलों की संसदीय समिति की रिपोर्ट में वायुसेना के सुखोई लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रनों की संख्या कम करके 25 बताने को लेकर पर्रिकर ने कहा कि अभी सुखोई विमानों की स्क्वाड्रनों की संख्या 35 हैं। हमें कुल 42 स्क्वाड्रन चाहिए। उन्होंने कहा कि बीते वर्ष उनके द्वारा नवंबर महीने में मंत्रालय का कार्यभार संभालने के बाद तीन हादसे हुए हैं। जिसमें नौसेना का टॉरपीडो रिकवरी विहिकल (टीआरवी) से जुड़ा हादसा भी शामिल है।  

अरूणाचल में चीन के विरोध की परवाह किए बगैर बनेंगी सड़कें

कविता जोशी.नई दिल्ली

पूर्वोत्तर में चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के करीब भारत द्वारा किए जाने वाले 22 सामरिक सड़कों के निर्माण को लेकर चीन के किसी विरोध की कोई परवाह नहीं की जाएगी बल्कि तेजी के साथ इन सड़कों के निर्माण के लक्ष्य को पूरा किया जाएगा। यह जानकारी यहां राजधानी में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने रक्षा संवाददाताआें से हुई मुलाकात में हरिभूमि द्वारा इस बाबत पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में दी। उन्होंने कहा कि अरूणाचल-प्रदेश में सड़कें बनाना हमारी जरूरत ही नहीं बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी है। काई भी हमारे मामलों में दखल नहीं दे सकता। इसपर हमारा दृष्टिकोण बिलकुल साफ है। 2 हजार किमी. लंबी सड़कों का जाल हम भारत की सीमा के अंदर बिछाने जा रहे हैं। इस निर्माण कार्य को हम पांच साल के अंदर पूरा करना चाहते हैं। उन्होंने भारत द्वारा जापान को सड़क निर्माण की जिम्मेदारी देने के तथ्य के बारे में कोई जानकारी होने से इंकार किया।   

क्या है चीन की आपत्ति?  
चीन अरूणाचल-प्रदेश को अपना इलाका बताता है। वो तर्क देता है कि यह इलाका तिब्बत स्वायत्तशासी प्रदेश (टीएआर) का हिस्सा है। इसलिए यह उसका हिस्सा है। दोनों देशों के बीच पश्चिमी से लेकर पूर्वोत्तर तक अंतरराष्‍ट्रीय सीमा का स्पष्ट निर्धारण नहीं है। ऐसे में चीन इस इलाके को विवादित इलाका बताकर वहां भारत द्वारा किए जाने वाले किसी भी निर्माण कार्य का विरोध करता है।

रक्षा मंत्रालय को बीआरओ की कमान
रक्षा मंत्री ने कहा कि देश की सीमाआें पर सड़क बनाने का काम सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) का है। बीआरओ इस समय दो मंत्रालयों के तहत काम कर रहा है। उसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी सड़क-परिवहन मंत्रालय के पास है और रक्षा मंत्रालय इसका संचालन करता है। ऐसे में एक विभाग के दो मास्टर होने से कई बार असमंजस की स्थिति बन जाती है, धन की कमी जैसी समस्याएं भी आड़े आती हैं। लेकिन अब बीआरओ की पूरी कमान रक्षा मंत्रालय के तहत आ गई है। इस बाबत हाल में मैंने सड़क-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से बात की है। अगले बजट में बीआरओ के लिए बजट रक्षा मंत्रालय के तहत आवंटित किया जाएगा।

निजी क्षेत्र बनेगा भागीदार
अभी सड़कें बनाने में काफी पुरानी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर हम उसी का इस्तेमाल करेंगे तो इन सड़कों का निर्माण करने में 15 साल लग जाएंगे। हम सड़कों का निर्माण 5 साल के अंदर करना चाहते हैं इसलिए हम आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण में हमने निजी क्षेत्र को भी शामिल करने का फैसला किया है।

रोहतांग टनल बनेगी मिसाल
अभी रोहतांग दर्रे पर सुरंग के जरिए सड़क बनाने का काम किया जा रहा है। हम अरूणाचल में भी ऐसी ही सुरंगों और बोरिंग पद्वति द्वारा सड़कें बनाने का काम करेंगे। साथ ही हमने पहले चरण में करीब 3 हजार किमी. लंबी सड़कों के निर्माण कार्य को राष्ट्रीय राजमार्ग को दे दिया है और अब हम सामरिक सड़कों के निर्माण कार्य में तेजी से आगे बढ़ेंगे।

एडमिरल जोशी के बाद थमी नौसेना में हादसों की रफ्तार?

कविता जोशी.नई दिल्ली

नौसेना के लिए गुजरता साल 2014 काफी उतार-चढ़ा •ारा हुआ रहा। साल की शुरूआत में 26 फरवरी को नौसैन्य उपकरणों की एक के बाद एक लगातार हो रही दुर्घटनाआें से बेहद आहत तत्कालीन नौसेनाप्रमुख एडमिरल डी.के.जोशी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसमें उन्होंने इन तमाम दुर्घटनाओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र देने की बात कही थी। उनके यूं अचानक इस्तीफा देने की घोषणा ने नौसेना से लेकर देश के राजनीतिक हलकों में सभी को सन्न कर दिया था। शुरूआत में ना तो तत्कालीन यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी की ओर से कोई बयान आया और ना ही कोई टिप्पणी। इस घटना को गुजरे अब करीब 10 महीने होने वाले हैं लेकिन जब हम नौसेना के लिए साल 2014 की यादों का विश्लेषण करते हैं तो यह घटना सबसे पहले जहन में ताजा होती है। इस घटना के बाद नौसैन्य उपकरणों की खराब हालत, मरम्मत की कमी जैसे तमाम बड़े सवाल उठ खड़े हुए थे। लेकिन इस सबसे इतर जब यह हम जांचने की कोशिश करते हैं कि क्या नौसेना में एडमिरल जोशी के जाने नौसैन्य उपकरणों की दुर्घटनाओं का सिलसिला रूका या नहीं। पड़ताल के बाद इसका जवाब ना में ही मिलता है।

साल 2014 की सबसे बड़ी घटना  
साल 2014 में नौसेना में सबसे बड़ी घटना तत्कालीन नौसेनाध्यक्ष एडमिरल डी.के.जोशी के इस्तीफे को कहा जा सकता है। जिसने हर खासोआम को एक बार को सन्न कर दिया था। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अपना कार्यकाल पूरा किए बिना अचानक किसी नौसेनाध्यक्ष के अपने पद से त्यागपत्र देने की शायद यह पहली रही होगी। एडमिरल जोशी ने नौसेना की पनडुब्बी आईएनएस सिंधुरत्ना में आग लगने की घटना के कुछ घंटे बीतने के बाद इस्तीफा दिया था। हादसे में 2 अधिकारियों की मौत हो गई थी। इससे पहले अगस्त 2013 में नौसेना की एक अन्य पनडुब्बी सिंधुरक्षक में धमाका हुआ और वो मुंबई तट के पास समुद्र में डूब गई। इस हादसे में पनडुब्बी में चालक दल के सभी 18 लोगों की मौत हो गई।

एडमिरल धोवन को नौसेना की कमान
फरवरी 2014 में एडमिरल जोशी के इस्तीफे के बाद मौजूदा नौसेनाध्यक्ष एडमिरल आर.के.धोवन को कार्यकारी नौसेनाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। लेकिन जल्द ही तत्कालीन यूपीए सरकार ने अप्रैल महीने में लोकसभा चुनाव में जाने से पहले नए नौसेनाप्रमुख के रूप में एडमिरल धोवन के नाम को मंजूरी दे दी।

नौसेना में 2014 में हुए 11 हादसे
नौसेना में साल 2014 में 11 हादसे हुए। 8 जनवरी को नौसेना के गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट आईएनएस बेतवा के सोनार डोम में दरार आई जिसमें किसी नौसैनिक या अधिकारी की मौत नहीं हुई। 17 जनवरी को नौसेना की पनडुब्बी आईएनएस सिंधुघोष हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बची। उस वक्त पनडुब्बी पर अधिकारी और नौसैनिक मिलकार 77 लोग सवार थे। हादसे के लिए रख-रखाव और तकनीकी खराबी जैसे तथ्य सामने आए। 23 जनवरी को नौसेना का मिसाइल वाहक युद्धपोत विपुल हादसे का शिकार हुआ। इसमें विपुल के पिलर कंपॉर्टमेंट में बड़ा सुराख था जिसे समय पर ठीक नहीं किया गया। 30 जनवरी को आईएनएस ऐरावत बंदरगाह में प्रवेश के दौरान दुर्घटना का शिकार हुआ। इसमें इसके पोर्ट प्रोपेलर को नुकसान हुआ।

26 फरवरी को पनडुब्बी सिंधुरत्न हादसे का शिकार हुई। 7 मार्च एमडीएल में निर्माणाधीन यार्ड 12701(कोलकात्ता) में परीक्षण के दौरान हादसा हुआ। 6 अप्रैल को आईएनएस मेटांगा, 28 जून आईएनएस कुथर, 2 जुलाई को आईएनएस चीता, 31 अक्टूबर को आईएनएस कोरा समुद्र में एक मालवाहक जहाज से टकराया और 6 नवंबर को टीआरवी-72 अभ्‍यास के दौरान बीच समुद्र में डूब गया। जहाज पर कुल 29 लोग सवार थे जिसमें 25 को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था। लेकिन एक अधिकारी की समुद्र से बाहर आने के बाद मौत हो गई थी। 4 अाज भी लापता हैं।   

पाक सेना ने जम्मू-कश्मीर में तोड़ा संर्घषविराम

हरिभूमि ब्यूरो.नई दिल्ली

जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में पाक सेना के रेंजरों ने बुधवार को संर्घषविराम का उल्लंधन किया। इसमें पाक सेना की ओर से नियंत्रण रेखा से लगे इस इलाके पर मोर्टार दागे गए। इसके विरोध में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों ने जवाबी कार्रवाई की। बीएसएफ के एक सूत्र ने बताया कि पाकिस्तानी रेजरों ने हीरानगर क्षेत्र की पंसार सीमावर्ती चौकी के अग्रिम इलाकों में देर रात करीब डेढ़ बजे छोटे हथियारों और मोर्टार दागकर संर्घषविराम का उल्लंधन किया।

उन्होंने कहा कि बीएसएफ की ओर से इसका कड़ा प्रतिवाद किया गया। दोनों के बीच करीब साढ़े तीन बजे तक रूक-रूक कर गोलीबारी होती रही। गोलीबारी में कोई हताहत नहीं हुआ है। गौरतलब है कि पाकिस्तानी सैनिकों ने इस वर्ष पूरे अगस्त महीने में सीमावर्ती इलाकों को निशाना बनाया। बीते अक्टूबर महीने में भी पाक सेना की ओर से 15 दिनों से अधिक तक नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर भारतीय सेना की चौकियों पर गोलीबारी की गई जिसमें 11 लोग मारे गए और 100 लोग घायल हो गए। गोलीबारी इतनी तेज थी कि करीब 32 हजार लोगों को विस्थापित भी होना पड़ा।    

हादसों से घिरा रहा वायुसेना के लिए बीतता साल!

कविता जोशी.नई दिल्ली

साल 2014 तेजी से अपने समापन की ओर बढ़ रहा है। समापन से पहले सशस्त्र सेनाआें के महत्वपूर्ण अंग वायुसेना की साल भर की चुनौतियों-उपलब्यिों पर चर्चा करें तो इसमें ज्यादातर वक्त हादसों के बीच बीता। साल भर एक के बाद एक वायुसेना के लड़ाकू से लेकर परिवहन विमान और हेलिकॉप्टर दुर्घटना का शिकार होते रहे। इसके बाद अंत में रही-सही कसर रक्षा मामलों पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट ने निकाल दी। इसमें वायुसेना के लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन की संख्या 34 से घटाकर 25 बताई गई।

साल 2014 में हुए प्रमुख हादसे
बीते वर्ष 2014 की शुरूआत में मार्च महीने में वायुसेना का विशालकाय विशेष परिवहन विमान सी-130जे ग्वालियर के पास हादसे का शिकार हुआ जिसमें पांच लोगों की मौत हो गई। इसके बाद मई महीने में वायुसेना का लड़ाकू विमान मिग-21 (बायसन) जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इसमें पायलट की मौत हो गई थी। जुलाई में वायुसेना का एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर (एएलएच) उत्तर-प्रदेश के सीतापुर में हादसे का शिकार हुआ। यह दुर्घटना इतनी भयानक थी कि हेलिकॉप्टर में सवार सभी 7 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद 14 अक्टूबर को वायुसेना का अग्रणी पंक्ति का लड़ाकू विमान सुखोई-30 एमकेआई पुणे के पास दुर्घटनाग्रस्त हुआ जिसमें सवार दोनों पायलट सुरक्षित बाहर निकल आए। इन हादसों जांच वायुसेना कर रही है।

चौबीसों घंटे चलाया राहत अभियान
जम्मू-कश्मीर में सितंबर महीने में आई विनाशकारी बाढ़ में वायुसेना ने युद्धस्तर पर राहत एवं बचाव कार्य चलाया। बाढ़ के दौरान जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने, मुश्किल में फंसे लोगों को निकालने से लेकर वायुसेना के परिवहन विमानों से लेकर हेलिकॉप्टर दिन-रात राहत और बचाव कार्य में जुटे रहे। वायुसेना के इन प्रयासों की वजह से कई इलाकों में अलगाववादियों ने इनका विरोध भी किया लेकिन वो कामयाब नहीं हो सके। वायुसेना के विमान राहत एवं बचाव सामग्री से लेकर मुसीबत में फंसे लोगों को बचाते हुए नजर आए।

विदेशी दौरे और संयुक्त युद्धाभ्‍यास 
साल 2014 में वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शल ने बीते वर्ष जहां आस्ट्रेलिया, जापान, वियतनाम, मलेशिया, ब्रिटेन जैसे देशों की यात्रा की और वहां उनके वायुसेना-प्रमुखों और राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात कर सामरिक सुरक्षा से जुड़े विभिन्न मसलों पर चर्चा की। इसके अलावा साल 2014 में वायुसेना ने रूसी वायुसेना के साथ मिलकर संयुक्त युद्धाभ्‍यास एवीआई-इंद्रा और फ्रांस की वायुसेना के साथ गरुड़ अभ्‍यास किया।

लड़ाकू विमानों की 25 स्क्वाड्रन   
रक्षा मामलों की संसदीय समिति द्वारा हालिया सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा गया कि वायुसेना का लड़ाकू विमानों का बेड़ा 25 है। इसके विपरीत वायुसेना का कहना था कि उसके पास लड़ाकू विमानों की 34 स्क्वाड्रन हैं। वायुसेना ने इस मसले की गंभीरता को देखते हुए अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी ओर से 34 स्क्वाड्रन का लिखित जवाब ही समिति को भेजा गया था। यह उनकी ओर से ही की गई गलती है।

बाढ़ से लेकर मतदान तक असली हीरो बनकर उभरी सेना

कविता जोशी.नई दिल्ली

देश की सामरिक और सीमाई सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील देश की पश्चिमी सीमा पर पड़ने वाला जम्मू-कश्मीर सेना के लिए हमेशा से चुनौती पेश करता रहा है। यहां सेना की करीब ढाई लाख फौज चौबीसों घंटे राज्य की सुरक्षा करने में जुटी हुई है। इन सबसे इतर जब हम तेजी से बीते रहे साल 2014 का आकलन करें तो राज्य के सुरक्षा हालात नियंत्रण में बने हुए नजर आए। दुश्मन हर बार की तरह चुनौती पेश करता रहा लेकिन सेना ने जी जान से उसका सामना किया और हर बार की तरह दुश्मन को मुंह की खानी पड़ी।

बाढ़ में असली हीरो बने जवान
यहां थलसेना के सूत्रों ने हरिभूमि को बताया कि गुजरते साल 2014 में जम्मू-कश्मीर में सिंतबर महीने में आई बाढ़ सेना के सामने बड़ी चुनौती लेकर आई। इसमें सूबे के आम बाशिदों से लेकर सेना को भी नुकसान पुहंचा। लेकिन अपने नुकसान की परवाह किए बगैर सेना ने आॅपरेशन राहत के जरिए दिन-रात जम्मू-कश्मीर के लोगों को मदद पहुंचाई। इससे शायद इतिहास में पहली बार सूबे के कई इलाकों में लोगों ने खुलकर सेना के जवानों के राहत कार्यों की प्रशंसा की। इससे बौखलाए अलगाववादियों ने कई जगहों पर सेना के राहत कार्यों में बाधा डालने का प्रयास किया जो कि असफल रहा।

विस चुनाव में दिया ठोस सुरक्षा घेरा
बाढ़ के बाद गुजरते साल में सेना के सामने जम्मू-कश्मीर के विस चुनाव दूसरी बड़ी चुनौती बनकर उभरे जिसमें सेना ने चुनाव के पांचों चरणों में सूबे को चाक-चौबंद सुरक्षा घेरा प्रदान किया। आतंकवादियों से लेकर अलगाववादियों ने मतदान के दौरान राज्य में अशांति फैलाने की पूरी कोशिश की लेकिन सेना ने अपने मजबूत इरादों के दम पर न सिर्फ  उनके हौसले पस्त किए बल्कि आतंक की किसी बड़ी वारदात को कामयाब होन से भी रोका। सेना के इस मजबूत सुरक्षा घेरे की वजह से जम्मू-कश्मीर में पहली बार विस चुनाव के दौरान मतदाताआें ने खुलकर वोट डाले जिसकी वजह से वोटिंग प्रतिशत 71 फीसदी के आंकड़ें को पार कर गया।

चीनी घुसपैठ को किया नियंत्रित
नए साल से चंद रोज के फासले पर हमारे पड़ोसी चीन ने पश्चिमी से लेकर पूर्वी सीमा तक घुसपैठ कर भारतीय इलाकों में घुसने की पूरी कोशिश की लेकिन सेना ने उनके मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया और हर प्रयास पर चीनी सैनिकों को उनके इलाके में वापस खदेड़ दिया। घुसपैठ से इतर बीते वर्ष भारतीय सेना ने चीन और अमेरिकी सेनाआें के साथ संयुक्त युद्धाभ्‍यास भी किया।

बड़ी खरीददारी का रास्ता हुआ साफ 
सेना के लिए खरीददारी के लिहाज से भी गुजरता हुआ साल महत्वपूर्ण साबित हुआ। रक्षा खरीद परिषद की बैठक में सेना की तोपों से जुड़ी मांग के वर्षों पुराने प्रस्ताव को रक्षा मंत्रालय ने स्वीकृति दी। इसके बाद अब सेना के लिए 155 एमएम 52 केलिबर की 814 तोपों की खरीददारी का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इसके अलावा स्पाइक एटीजीएम मिसाइलों की खरीद को भी मंजूरी मिल गई है।